पेंशन : सबसे वफादार प्रेमिका (हँसते-हँसते सच)
जब बाल
काले से सीधे “चाँदी संस्करण” में बदल जाएँ,
घुटने हर कदम पर
“कट-कट-कट” की रिंगटोन बजाने लगें,
और चश्मा न हो तो
दुनिया 4K नहीं…
बस धुंधली सी कविता लगे—
तब दफ्तर कहता है,
“धन्यवाद, अब आप घर पर आराम कीजिए।”
लेकिन तभी
एक आवाज़ आती है—
न बॉस की,
न HR की—
“अरे हीरो!
मैं हूँ न…”
उस आवाज़ का नाम है—
पेंशन!
वाह!
क्या प्रेमिका है ये,
न वॉट्सऐप पर ब्लू-टिक का झगड़ा,
न ‘आज मूड नहीं है’ का ड्रामा,
हर महीने तय तारीख को
सीधे अकाउंट में एंट्री—
“डार्लिंग,
मैं आ गई…
पूरे महीने का खर्चा लेकर!”
ये न छुट्टी लेती है,
न इस्तीफ़ा देती है,
न कभी कहती है—
“बजट टाइट है, बाद में बात करेंगे।”
ये तो ऐसी संस्कारी नायिका है
जो बिना बोले कह देती है—
“चाय मैं पिलाऊँगी,
दवा भी मैं ही दिलाऊँगी।”
जवानी की नौकरी
पहली मोहब्बत जैसी होती है—
जोश में शुरू,
टारगेट में उलझी,
और आख़िर में
“अब आगे नहीं बनती” कहकर विदा।
लेकिन पेंशन?
वो तो
शादी के बाद वाली समझदार पत्नी है—
कम बोले,
ज़्यादा निभाए,
और हर महीने
राशन का इंतज़ाम कर जाए।
शाम को जब
चाय, बिस्किट
और पुराने दर्द साथ बैठते हैं,
पेंशन पास आकर कहती है—
“डरो मत,
बुढ़ापा है, बीमारी नहीं।
मैं हूँ न—
EMI भी संभाल लूँगी,
और मन भी।”
तब समझ में आता है—
सैलरी थी
तेज़ रफ्तार वाली प्रेमिका,
पर पेंशन है
जीवन की असली हीरोइन।
जो आख़िरी सीन तक
साथ निभाती है
और फिल्म के अंत में
लिख देती है—
“The End –
With Monthly Support.”
बस साल में एक बार
नवम्बर आता है,
और सरकार पूछती है—
“ज़िंदा हो न?”
हम मुस्कराकर कहते हैं—
“हाँ जी,
पेंशन है न…
तो दिल भी धड़क रहा है!” 😄
G D Pandey


